Sunday, July 11, 2010

ऑक्टोपस बाबा के बहाने.......

ये सपेरों और नागाओं का देश है......यहाँ तंत्र -मंत्र और काला जादू होता है......रहस्य और रोमांच से भरा पड़ा है पूर्व का ये देश......पश्चिम के लोगों के यही विचार हुआ करते थे भारत के प्रति...... उनकी ये धारणा आज भी नहीं बदली है...... तो फिर हम ऑक्टोपस बाबा को क्या कहेंगे,जिसकी आजकल पूरी दुनिया में धूम है....... क्या ये अंधविश्वास नहीं है और क्या पूरा पश्चिमी जगत इसी अंधविश्वास की गिरफ्त में नहीं है?....ये तो विज्ञानं को ही सब कुछ मानने वाले लोग है....फिर ऐसा क्या हुआ कि पूरा पश्चिम एक ऑक्टोपस की भविष्यवाणियों पर विश्वास करने लगा .....फीफा के सबसे प्रतिष्ठित विश्व कप फुटबाल में टीमों और उसके खिलाडियों के प्रदर्शन की बजाय ऑक्टोपस बाबा की भविष्यवाणी जीत की गारंटी मानी जाने लगी......ये संयोग हो सकता है कि ऑक्टोपस बाबा की अभी तक कि भविष्यवाणी सही साबित हुयी है और ये भी संयोग हो सकता है कि रविवार की आधी रात को होने वाले मुकाबले में भी ऑक्टोपस की भविष्यवाणी के अनुसार स्पेन नया चैम्पियन हो जाये.....हंसी तो तब आती है जब जर्मनी के लोग ऑक्टोपस बाबा को मारने और स्पेन के राष्ट्राध्यक्ष उसको सुरक्षा देने की बात करते है.....खैर आदमी कोई भी हो.....चाहे उसकी चमड़ी गोरी हो.....या फिर काली हो ....जो भी उसके मन मुताबिक होगा....जो भी उसकी सहूलियत का होगा, उसे ही वो सही मानता है......तो फिर हमारे देश में सड़क किनारे बैठ कर तोते से भविष्य बताने वाले पंडित जी या फिर नंदी स्वरुप बैल से आने वाले कल का हाल बताने वाले ज्योतषी क्या बुरे है.....उनके बारे में गलत धारणा पालने की भूल अब शायद पश्चिम के लोग ना कर पाए.वैसे हमारे देश में भविष्यवाणी करने के लिए बड़ा ही तार्किक विज्ञानं है और पश्चिम के लोग चाहे तो इसका लाभ भी ले सकते है....और पश्चिम के भाइयों....हमारा ये दावा है कि ऑक्टोपस बाबा तो केवल फुटबाल में जीत-हार ही बता रहे है,हमारा ज्योतिष विज्ञानं तो आपके जीवन की जीत-हार तक को सटीक ढंग से बता देगा.

Monday, July 5, 2010

......देखो भाई देखो

......देखो भाई देखो.....धोनी की शादी का तमाशा देखो......वो भी लाइव.......सिर्फ हमारे चैनल पर.....यदि हिंदी के देश के नामी-गिरामी चैनलों को धोनी की शादी की कव्हरेज का प्रोमो बना कर चलाना होता तो वो कुछ इसी तरह की लाइनों का इस्तेमाल करते.खबर को रबर की तरह खींचने की महारत तो इन चैनलों को पहले से ही हासिल है,अब तो प्रतिस्पर्धा ये है कि सेलिब्रिटी के निजी जीवन में कौन कितना झांक सकता है.....और इसी भेड़चाल के चक्कर में चैनलों के कर्णधार ये नहीं समझ पा रहे है वो खबर बेचने के बाजार में खुद को जमीर को नीलम कर रहे है.....धोनी की बारात में किसकी मशाल जलेगी और उनकी वरमाला में कौन से फूल लगे है.....ये खबर कैसे हो सकती है...

Friday, June 18, 2010

धर्मं की आड़ में नशे का सौदा

वो साधू के वेश में शैतान निकला.......लोग उसे पूजते थे और वह उन्हें मौत बांटता था....... वो धर्म की आड़ में नशे का सौदा कर रहा था.......लेकिन कहते है कि हर बुराई का कभी न कभी अंत होता है और बुरे काम करने वाले को सजा भी जरूर मिलती है..... जबलपुर के मौनी बाबा भगवा वस्त्रों की आड़ में भी पंद्रह साल से स्मेक और ब्राउन शुगर बेचते थे पर किसी को उन पर शक नहीं हुआ......पर आज वे पकडे गए और भगवा के पीछे छिपा उनका काला चेहरा सबके सामने आ गया।पुलिस ने उन्हें उत्तर प्रदेश के दो लोगों के साथ ब्राउन शुगर का सौदा करते रंगे हाथ पकड़ा. उनके पास से आधा किलो ब्राउन शुगर पकड़ी गयी. ये मौनी बाबा अपनी मौन तपस्या के कारण जबलपुर के साथ आस-पास के इलाकों में भी पूजे जाते थे लेकिन आज उनकी सारी पोल खुल गई ....मृत्युंजय महाराज उर्फ़ मौनी बाबा नशे के बहुत बड़े सौदागर निकले...पुलिस ने उन्हें आधा किलो ब्राउन शुगर के साथ उस वक्त रंगे हाथ पकड़ा जब वो इलाहाबाद से आये दो लोगो से उसे खरीदने का सौदा कर रहे थे.

Monday, June 14, 2010

हाय ये मौन

ये सवाल आज हर भारतीय के मन में कौंध रहा है कि क्या मजबूरी थी......... वारेन एंडरसन को देश से भगाने के पीछे........ कौन इसके लिए जिम्मेदार है........और क्यों नहीं मुंह खोल रहे है भारतीय राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अर्जुन सिंह.......यह मौन क्यों.......क्या पंद्रह हजार से ज्यादा निरीह लोगों की मौत और उनके परिवारों की चीख भी उनके अंतःकरण में खलबली नहीं मचा रही है या फिर यह मौन ही उनके अपराध को छिपाने का हथियार है.
खैर अर्जुन सिंह से तो बहुत से लोग ये जवाब मांग रहे है.....हमें जब पता चला कि वारेन एंडरसन को सरकारी गाड़ी में व्हीआईपी मेहमान बनाकर एअरपोर्ट तक ले जाने वाले भोपाल के तब के पुलिस कप्तान स्वराज पुरी इन दिनों जबलपुर में ही है तो हमारे मन में भी ये सवाल उठने लगा कि किसके आदेश पर तब के कलेक्टर मोती सिंह को लेकर स्वराज पुरी एंडरसन को लेकर एअरपोर्ट दौड़ पड़े थे........हमने सोचा कि शायद इसका जवाब उनके पास जाने से मिल जाये......हालाँकि मौका ऐसा नहीं था कि भाई की मौत का शोक मना रहे किसी व्यक्ति के पास बीती बातों को कुरेदने के लिए इस तरह जाया जाये......लेकिन पंद्रह हजार मौतों के गुनेहगार को देश से भगाने के गुनाह में शरीक व्यक्ति से जवाब मांगने के लिए कोई भी अवसर जायज हो सकता है...... और यही सोच कर कुछ साथियों के साथ हम मन में कई अनसुलझे सवालों की सूची बना कर पहुँच गए स्वराज पुरी से मिलने......जैसी की उम्मीद थी भाई की मौत के बहाने से वे हमारे सवालों से बच जायेंगे......वही हुआ ......यहाँ भाई की मौत के बहाने धारण किये मौन को अपने अपराध को छिपाने का हथियार बना लिया गया.
इसी बीच ये भी पता चला कि तीन हजार मौतों की एफआईआर लिखने वाले हनुमानगंज थाने के तब के प्रभारी सुरेन्द्र सिंह भी जबलपुर के ही है......तो लगा क्यों न उन्ही से बात करके ये समझा जाये कि यूनियन कार्बाइड से गैस रिसने के बाद भोपाल के क्या हालात थे......लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए की उन्ही के थाने में दर्ज गैर जमानती अपराध में वारेन एंडरसन को सिर्फ पच्चीस हजार के निजी मुचलके पर जमानत दे दी गयी थी.......और उसको भगाने के अपराध में सुरेन्द्र सिंह भी शामिल है.........इस समय सागर में एस पी (अजाक) हो गए सुरेन्द्र सिंह की खोजबीन की गयी तो वे कहीं नहीं मिले.......न सागर में और न ही अपने गृह नगर जबलपुर में..... उनके मोबाईल बंद है और दफ्तर से बताया गया कि साहब एक हफ्ते की छुट्टी पर है......उनकी कोई लोकेशन भी नहीं मिल रही है......वे छुट्टी के बहाने मौन हो गए है.

Saturday, June 12, 2010

तो नेताओं की कठपुतली होते

लगता है कि सीबीआई के निदेशक अश्विनी कुमार मीडिया में भोपाल गैस त्रासदी की खबरें पढ़ और देख-सुनकर पक से गए है......तभी तो वे जबलपुर में पत्रकारों को नसीहत देते दिखे कि क्या अभी भी पच्चीस साल पुराने मामले का पोस्ट मार्टम करने में जुटे हो....go ahead....आगे बढ़ो और ये चिता करो की भविष्य में इस तरह की त्रासदी ना हो और हो भी तो पीड़ितों को जल्द से जल्द राहत मिल सके.......भाई सीबीआई निदेशक को कौन समझाए कि यदि मीडिया अपनी आवाज ना मुखर करे तो ये नेता ऐसे ही लाशों का सौदा करते रहेंगे....और ये मीडिया न हो तो जीतनी स्वतंत्रता से सीबीआई निदेशक फ़िलहाल काम कर रहे है........नेता उतनी भी स्वतंत्र उन्हें न दे......और पूरी तरह से अपनी कठपुतली बना कर अपनों को बचाने और दुश्मनों को निपटाने की नौकरी बजवाएं.... वैसे सीबीआई निदेशक अश्विनी कुमार ने ये मान कर बड़ी मेहरबानी कर दी कि ट्रायल और अभियोजन के दौरान उनकी संस्था की ओर से कमी रह गयी.....लेकिन आगे के लिए उनका दिया ये भरोसा कितना सही होगा कि अब कोई भी जाँच छः माह में पूरी करके दोषियों को दो साल में सजा दिलवा देंगे, ये वक्त ही बताएगा.

Monday, June 7, 2010

मी लॉर्ड...क्षमा कीजियेगा

हमें याद है,.....जब भोपाल गैस त्रासदी हुयी थी.....उस वक्त मैं सातवीं कक्षा का विद्यार्थी था और अर्जुन सिंह ने न जाने क्या सोचते हुए गैर बोर्ड कक्षाओं के छात्रों को जनरल प्रमोशन दे दिया था.बिना इम्तिहान के पास होने पर मुझे उस वक्त तो गैस त्रासदी ने भी वैसी ही ख़ुशी पहुंचाई थी, जैसी आज भोपाल के गुनाहगारों को हुयी है......लेकिन पंद्रह हजार से ज्यादा मौतों पर कोई खुश कैसे हो सकता है.....वो तो नादानी थी वर्ना आज तो रोने को जी चाह रहा है.....मी लॉर्ड...क्षमा कीजियेगा, आप की चाहे जो मजबूरी रही हो लेकिन ये फैसला हमें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है.युनियन कार्बाइड हादसे के वास्तविक दोषी तो वे नेता है जिन्होंने पंद्रह हजार कत्ल के गुनेहगार वारेन एन्देर्सन को देश से भाग जाने दिया.....वैसे पीड़ितों का आक्रोश और क्रंदन देख कर आज की रात तो उन नेताओं को भी नींद नहीं आएगी.

प्रदीप को सलाम

जबलपुर-दमोह के बीच सड़क हादसे में पांच लोगों की मौत हो गयी और आधा दर्जन लोग घायल हो गए.....ये घटना है तो बेहद दुखदायी लेकिन केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन की मानवीयता ने मन को जरूर तसल्ली पहुंचाई.......वैसे प्रदीप जैन निकले तो थे उधार का धर्म करने लेकिन उन्होंने नगद का धर्म करके सचमुच में मानवता का धर्म निभाया.......जैन संत तरुण सागर जी के दर्शन के लिए तेंदुखेडा जा रहे केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन ने जब इस दुर्घटना में घायल लोगों को सड़क तड़पता देखा तो उन्होंने तुरंत अपना काफिला रोक दिया और घायलों को अपनी कार में लेकर जबलपुर रवाना हो गए ताकि उन्हें जल्द से जल्द बेहतर उपचार मिल सके......एक वक्त तो परोपकार करने निकले प्रदीप जैन की खुद की जान पर बन आई जब घायलों को जल्दी अस्पताल पहुँचाने की हड़बड़ी में उनकी कार भी दस फीट गहरे गड्ढे में चली गयी..... प्रदीप जैन को हल्की चोट भी आई लेकिन इससे उनके चहरे पर सिकन तक नहीं आई और पीछे चल रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं की कार में घायल को बिठाकर उन्होंने फिर उसी रफ़्तार से दौड़ लगा दी..केंद्रीय मंत्री के प्रयासों से पांच घायलों को जबलपुर लाकर बेहतर इलाज दिया जा सका जिससे उनकी जान बच गयी......लोगों को याद होगा कुछ समय पूर्व तमिलनाडु के एक मंत्री ने सड़क पर तड़पते एक पुलिस अधिकारी की कोई मदद नहीं की थी जिससे उसकी जान चली गयी....तभी तो केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन को सलाम करने का मन करता है...............

Sunday, April 12, 2009

उनके लिए तो गाली है ....'' जय हो ''

कांग्रेस का चुनावी गीत - '' जय हो .......'' मध्य प्रदेश के उन गरीब आदिवासियों और पिछडे तबके के लोगों को किसी गाली से कम नहीं लग रहा है , जिन्होंने कथित विकास के लिए अपना सब कुछ गँवा दिया और वे खुद आज तक विकास से महरूम है.इस प्रदेश की जीवन रेखा कही जाने वाली नर्मदा में बने बरगी बांध के डूब क्षेत्र के हजारों परिवारों को 1990 में अपने घर-द्वार, खेती-बाड़ी, बाग-बगीचे गंवाने पड़े लेकिन इन 19 सालों में उन्होंने गरीबी और मुफलिसी के सिवाय कुछ नहीं देखा.आज अधिकांश विस्थापित गांवों के लोगों को न तो रोजगार गारंटी स्कीम का लाभ मिल रहा है और न ही वे किसी अन्य सरकारी योजना के हक़दार है.उनका कसूर सिर्फ इतना है कि वे अपने घर डूबने के बाद जहाँ बसे वह वन क्षेत्र है.

कांग्रेस का दावा है कि उसने रोजगार गारंटी स्कीम शुरू करके गरीबों को उनके गाँव में ही सौ दिन का रोजगार मुहैया कराया है.आजकल टीवी चैनलों में आस्कर विजेता गीत '' जय हो '' के माध्यम से इसका जोर-शोर से प्रचार भी किया जा रहा है ताकि कांग्रेस को वोट हासिल हो सके.लेकिन रोजगार गारंटी स्कीम मध्य प्रदेश के जबलपुर, मंडला और सिवनी जिले के एक सैकडा गांवों के लिए सिर्फ छलावा है.ये गांव उन गरीब आदिवासियों और पिछडे लोगों के है, जो बरगी बांध बनने के साथ ही विस्थापित हो गए.1990 में जब बांध में पहली बार पानी भरा गया तो उनका आशियाना उजड़ गया और उन्हें जहाँ जगह मिली अपना नया घरौंदा बना लिया.किन्तु उन्हें नहीं मालूम था कि जहाँ वे अपना नया घरौंदा बना रहे है ,वह वन क्षेत्र है.

यूँ तो बरगी बांध के विस्थापितों के सरकारी शोषण और उत्पीडन के किस्से कोर्ट - कचहरी के चक्कर में शहर आने वाले नर्मदा बचाओ आन्दोलन से जुड़े लोगों के मुंह से अक्सर सुनने को मिलते थे लेकिन उनकी वास्तविक हालत देखने का मौका पिछले दिनों उस वक्त मिला, जब नर्मदा में गिरे एक विमान की खोजबीन की कवरेज़ के लिए डूब क्षेत्र के गाँव गाडाघाट पहुंचा.इलाके से बखूबी परिचित नर्मदा बचाओ आन्दोलन के राजकुमार सिन्हा को भी मदद के लिए साथ में ले लिया.बातचीत के दौरान पहले तो राजकुमार सिन्हा ने ही विस्थापितों के दर्द से अवगत कराया.बाद में जब गाँव पहुचे तो हकीकत और भी कड़वी लगी.यहाँ न तो पक्की सड़कें मिली और न ही स्कूल भवन. जबलपुर से 70 किलोमीटर दूर डूब क्षेत्र के गाँव गाडाघाट में हर जाति और बिरादरी के लोग रहते है.लेकिन रोजगार सबका एक ही है, बरगी बांध के जलग्रहण क्षेत्र में मछली पकड़ना.गर्मी के दिनों में जरूर कुछ लोग पानी कम होने पर नर्मदा कछार के क्षेत्र में थोडी बहुत खेती कर लेते है.एक बात और बता दें, न तो वहां जय हो ......... की गूँज है और न ही भय हो .........की.

बरगी बांध बनाने से जबलपुर , मंडला और सिवनी के 165 गाँव डूब क्षेत्र में आ गए.इनके घर - द्वार के साथ हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि भी नर्मदा के अथाह जल में समा गयी.डूब क्षेत्र के गरीब परिवारों के लिए न तो उचित बसाहट का इंतेजाम किया गया और न ही उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये गए. डूब क्षेत्र के अधिकांश गांवों के लोग मजबूरी में आस-पास की वन भूमि में बस गए.अब सरकारी नियम - कानून इन गरीबों के व्यक्तिगत और सामुदायिक विकास में बाधक बन रहे है.'' जय हो ......'' गीत के माध्यम से रोजगार गारंटी स्कीम का ढिंढोरा पीटने वाली कांग्रेस सरकार आज तक उस कानून में संशोधन नहीं कर सकी जो वन ग्राम में बसे होने के कारण इन गरीब आदिवासियों और पिछडे तबके के लोगों को सरकारी योजनाओं से महरूम रखे हुए है.

नर्मदा बचाओ आन्दोलन से जुड़े राजकुमार सिन्हा का कहना है- वन संरक्षण कानून वन क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण की इजाजत नहीं देता है.बरगी बांध के डूब क्षेत्र के अधिकांश गांवों में रोजगार गारंटी स्कीम लागू नहीं है.यहाँ इंदिरा आवास योजना के तहत् गरीबों के लिए मकान नहीं बन सकते.न ही स्कूल भवन बन सकता है और न ही सामुदायिक केंद्र.जबलपुर की बगदरी गाँव की पंचायत ने बच्चों के लिए स्कूल भवन क्या बना लिया, उसके चुने हुए पदाधिकारियों के खिलाफ सरकारी जाँच शुरू हो गयी.इन गांवों में रोजगार का सिर्फ एक साधन है मछली पकड़ना.बच्चे-बूढे, महिला-पुरुष सब सुबह से मछली पकड़ने नर्मदा में उतर जाते है.लेकिन अब बांध में मछलियाँ भी कम हो गयी है.लिहाजा गाँव वालों को मजदूरी के लिए शहर भागना पड़ रहा है.वैसे उन्हें मछली का दम भी बेहद कम मिलता है.जो मछली बाजार में 100 रुपये प्रति किलो बिकती है, उसका दाम इन मछुआरों को सिर्फ १८ रुपये मिलता है.

बरगी बांध के डूब क्षेत्र में आने वाले लोगों को अपने घर-खेत जाने का बड़ा गम है.जो कभी गाँव के मालगुजार ( छोटे जमींदार ) होते थे, वे आज जबलपुर जैसे शहर में सायकिल रिक्शा चला कर अपना और परिवार का गुजारा कर रहे है.उनके पास गाँव में न तो घर रहा और ना ही रोजगार का साधन.जमीन और मकान के बदले सरकार ने जो मुआवजा दिया वह इतना थोडा था कि नई जगह पर नए जीवन की शुरुआत बेहद कठिन थी. मेघा पाटकर सरीखी जीवट महिलाओं ने नर्मदा बचाओ आन्दोलन शुरू किया, लम्बी लडाई लड़ी तब जाकर डूब क्षेत्र के आदिवासियों और गरीब परिवारों के शोषण में कुछ कमी आयी.उन्हें बांध की मछली पर अधिकार मिला और उनकी आजीविका चल पड़ी.लेकिन कांग्रेस या दीगर सरकारें कितना भी दावा करें कि वे गरीब हितैषी है,उसमे तनिक भी सच्चाई नहीं है.

Tuesday, April 7, 2009

जूते की राजनीति या राजनीति का जूता

अदना से जूते ने पूरे देश में उथल-पुथल मचा रखी है.अभी तक दुनिया में दो ही लोगों के जूतों की सबसे ज्यादा चर्चा होती थी.मरहूम फिल्मकार राजकपूर को जापानी जूता बहुत पसंद था, तभी तो वे गाते थे- मेरा जूता है जापानी......और उनके साथ लोग भी झूम-झूम कर ये गाना गाते थे. दूसरा, इराकी पत्रकार मुंतजिर अल जैदी का जूता भी बड़ा फेमस हुआ, जो उसने अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश पर फेंका था.मुंतजिर के इस जूते की चर्चा पूरी दुनिया में हुयी.इराक में तो मुंतजिर की डिजाईन के जूते घरों में शोपीस के रूप में सज गए. लेकिन आज हमारे देश के जूते ने भी ख्याति अर्जित कर ली.ये जूता है भारतीय पत्रकार जरनैल सिंह का.टीवी चैनलों पर जरनैल सिंह का जूता तो लाखों-करोडों के विज्ञापन करने वाले एडीडास और रीबोक के जूतों से भी ज्यादा छाया हुआ है.जब से ये खबर आयी है कि दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह ने सीबीआई द्वारा जगदीश टायटलर को ८४ के सिख दंगो में क्लीन चिट दिए जाने से नाराज होकर गृह मंत्री पी. चिदंबरम पर जूता फेंका है , तब से लोग ये जानने के लिए बेचैन है कि जरनैल ने किस कंपनी का जूता पहन रखा था ? उसके जूते की डिजाईन कैसी थी ? उसके जूते का नंबर क्या था ?शायद वे भी उसी कंपनी, उसी डिजाईन और उसी नंबर का जूता पहन कर अपने आक्रोश को व्यक्त करने का प्रयास करना चाहते हों.

आज के पहले मैंने कभी भी अपने जूतों को इतने से ध्यान से नहीं देखा. सुबह जब मैं घर से निकलने को हुआ तो मैंने रोज की तरह काफी मजबूती से अपने जूते की लेस बांधी.जूता पहनते समय अमूमन ये डर बना रहता है कि यदि लेस ठीक से नहीं बांधी तो वो खुल जायेगी और पैर में अटकने से गिरने का खतरा हो सकता है.इसीलिए मैं तो अपने जूते की लेस बड़ी मजबूती से बांधता हूँ.आज के पहले कभी ये ख्याल भी नहीं आया कि जूतों का यूँ राजनीतिक इस्तेमाल भी हो सकता है.अकाली दल वाले उसे टिकट देने की घोषणा कर रहे है तो शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने दो लाख का इनाम दे दिया है. जरनैल सिंह के जूतों ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है.चिदंबरम पर जूता फेंकने की खबर मिलते ही मेरी नजर सबसे पहले मेरे जूतों पर गयी, जो अक्सर मेरे पैरों में बंधे रहते है या यूँ कहे कि मेरे पैरों को बांधे रखते है.समाज में इतनी कमियां और बुराइयाँ है, जो आप-हम , सब को हमेशा उद्वेलित करती है.भ्रष्ट नेताओं और अफसरों को हमेशा जूता मारने का मन करता है लेकिन हमारे पैरों में मजबूती से बंधा या पैरों को मजबूती से बांध कर रखने वाला जूता कभी नहीं उतरा.मर्यादा जूते की नहीं हमारी अपनी है.हम भी रोज किसी पर जूता उछाल सकते है लेकिन उससे हासिल क्या होगा ?शायद अब जरनैल सिंह को भी पश्चाताप हो रहा होगा,यदि उनका मिशन कुछ और नहीं है तो........

एक बात और.....जरनैल सिंह के जूते की प्रसिद्धि अब यहीं रूक जानी चाहिए.ये जूता सिर्फ चिदंबरम या कांग्रेस के गाल पर नहीं पड़ा है बल्कि इसने हमारी पूरी व्यवस्था पर चोट की है.ये भी उतनी कड़वी सच्चाई है कि सीबीआई और सरकारें 25 साल बाद भी सिखों के नरसंहार के आरोपियों को आज तक सजा नहीं दिला पायीं.इसलिए सिखों के मन में गुस्सा होना स्वाभाविक है.लेकिन हमारे देश औए समाज में गुस्से का जरनैल के अंदाज वाला इजहार भी मंजूर नहीं है.

पीपल बाबा की नई कोपलें

आज सुबह रोज की भांति अख़बारों पर नजर डाल रहा था......नईदुनिया की एक खबर पर नजर अपने आप अटक गयी.इस खबर ने दिल को बड़ा सुकून दिया.खबर थी कि 17 मार्च को करमचंद चौक से श्रीनाथ की तलैया में स्थानांतरित किये गए डेढ़ सौ साल के बूढे पीपल बाबा के शरीर से नई कोपलें फूट पड़ी है. पीपल बाबा को नई जगह रास आ गयी और उनके बूढे शरीर ने फिर से ताजगी का अहसास किया है.मुझे तो पक्का यकीन है कि बूढे पीपल बाबा की कहानी जरूर भगवान ने भी पढ़ी होगी. और पीपल बाबा में नई जान डाल कर उसने भी मनुष्यों के प्रयासों को व्यर्थ नहीं जाने दिया.अब ये निश्चित मानिये कई पीपल बाबा जैसे कई दरख्त कटाने की बजे नई जगह पर खुद भी नई सांसे लेंगे और मनुष्यों को भी नई सांसे देंगे..... मनुष्य वाकई धन्यवाद का पात्र है.

Wednesday, April 1, 2009

वाह री किस्मत

पिछले दिनों मैंने आपको नेशनल टीवी के हम जैसे पत्रकारों का दुखडा सुनाया था कि जबलपुर से किसी सेलिब्रिटी के चुनाव न लड़ने से हम लोगों का बड़ा नुकसान होने वाला है.लेकिन पता नहीं हमारे दुखी मन की पीड़ा भगवान ने कांग्रेसियों तक पहुंचाई या फिर कांग्रेसी खुद से ही हमारे दुःख को जान गए.प्रत्याशी न सही वे चुनाव प्रचार के लिए फिल्म स्टार तो ले ही आये.इससे क्या फर्क पड़ता है कि ये फिल्म स्टार हीरो थे या विलेन.बल्कि हम तो ये कहेंगे कि यदि हीरो या हीरोईन होती तो एक ही खबर बिकती.वो तो भला हो शक्ति कपूर और किरण कुमार का.उन्होंने एक नहीं दो खबरें बिकवा दी.वे ठहरे विलेन सो उन्होंने हरकत भी वैसी ही कर दी.कांग्रेस का प्रचार करने जबलपुर आये शक्ति कपूर गाँधी जी के चित्र वाली टी शर्ट पहिन कर सिगरेट के कश पे कश उडाते रहे.हम पत्रकारों की नजर होती बड़ी तेज है.तत्काल कैमरों ने शक्ति कपूर को उसी अवस्था में कैद कर लिया और खबर भेज दी चैनल को.....चैनल वालों ने भी खबर को तत्काल लपक लिया.अधिकांश चैनलों ने इस खबर को चलाया.बीजेपी वालों को शक्ति कपूर और किरण कुमार का रोड़ शो बर्दाश्त नहीं हुआ.उन्होंने शिकायत कर दी कि ये रोड़ शो बिना अनुमति के हुआ है.लो भैया....दूसरी खबर भी बेचने का जुगाड़ हो गया.इधर जिला निर्वाचन अधिकारी ने शक्ति कपूर और किरण कुमार के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन का मामला दर्ज किया, उधर हम लोगों ने झट से प्रशासन की बाईट लेकर दूसरी खबर भी भेज दी.इसे कहते है.....वाह री किस्मत.

Saturday, March 28, 2009

* नियम और शर्ते लागू

राजनीति के बाजार में आजकल नए - नए प्रोडक्ट सामने आ रहे है. मतदाताओं को उपभोक्ता समझ कर राजनीतिक पार्टियाँ लुभावने नारों के साथ मनभावन योजनायें भी पेश कर रही है. कांग्रेस कह रही है कि हमको वोट करोगे तो तीन रुपये किलो अनाज देंगे........वहीँ बीजेपी के पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण अडवाणी तो देश भर के मोबाइल उपभोक्ताओं को एसएमएस करके शपथ ले रहे हैं कि अब हर लाडली लक्ष्मी होगी.......बस वोट हमको देना.

देश के इस आम चुनाव में राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव प्रचार के लिए मल्टी नेशनल कंपनियों जैसा तौर-तरीका अपनाया है लेकिन वे अपनी लोक-लुभावन योजनाओं का प्रचार करते समय -" नियम और शर्ते लागू " लिखना भूल गयी है.अमूमन कारपोरेट घराने अपने प्रोडक्ट का विज्ञापन करते समय जब कोई योजना सामने लाते है तो उसमे स्टार ( * ) लगाकर " नियम और शर्ते लागू " लिखना कभी नहीं भूलते. दरअसल योजना बताई कुछ और जाती है लेकिन उसके भीतर का सच कुछ और होता है.

ऐसा ही कुछ कांग्रेस और बीजेपी की योजनाओं में भी छिपा है. न तो कांग्रेस सत्ता में वापस लौटने पर देश के हर गरीब को तीन रुपये किलो अनाज दे सकती है और न ही बीजेपी के पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण अडवाणी देश की हर लड़की को एक लाख का चेक देकर लाडली लक्ष्मी बना सकते है.चुनाव जीतने के तत्काल बाद ही ये दल गिरगिट की तरह रंग बदल लेंगे और उपभोक्ता बाजार की तरह इनकी योजनाओं में भी " नियम और शर्ते लागू " हो जाएँगी.सरकार बनाने के बाद कांग्रेसी कहेंगे कि लाल, पीले, नीले राशन कार्ड वालों को ही तीन रुपये किलो अनाज मिलेगा. अब बेचारा गरीब आदमी ऐसे कार्ड बनवाने के लिए ही भटकता रहेगा.बीजेपी की लाडली लक्ष्मी योजना फ़िलहाल मध्य प्रदेश में चल रही है लेकिन इसमें भी एक फंडा है कि जो इंकम टैक्स चुकाता है उसे इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा.कुछ ऐसी ही शर्त अडवाणी जी भी लगा देंगे.

नेताओं के भाषण, रैली और क्रियाकलापों पर नुक्ताचीनी करने वाले निर्वाचन आयोग को ये भी देखना चाहिए कि राजनीतिक दल और उसके नेता मतदाताओं को अपनी गलत या आधी-अधूरी लोक-लुभावन योजनाओं से प्रभावित करने की कोशिश न करें.राजनीतिक दलों को यदि अपने पोलिटिकल प्रोडक्ट में कुछ छिपाना भी है तो कृपया " नियम और शर्ते लागू " जरूर लिखे.ताकि मतदाता भ्रमित न हो और अपने लिए सही पोलिटिकल प्रोडक्ट का चयन करके वोट करे.

Wednesday, March 25, 2009

टूटे मंदिर - मस्जिद पर न हुआ दंगा

6 दिसम्बर 1992.... कभी न भूलने वाला वो दिन...... अयोध्या में कारसेवकों का जत्था कूच कर रहा था उस विवादित ढांचे की ओर , जिसे हिन्दू रामजन्म भूमि बताते है तो मुसलमान बाबरी मस्जिद.हमने वो मंजर देखा तो नहीं था लेकिन जैसा कि उस समय के गिनती के टीवी चैनल ने दिखाया और बताया था, कुछ भी शेष न छोड़ने की तैयारी थी.असल में वो रामजन्म भूमि है या बाबरी मस्जिद, हम इस विवाद में नहीं पड़ना चाहते हैं क्योंकि अभी तक देश की सर्वोच्च अदालत भी नहीं बता पायी है कि वास्तव में यहाँ था क्या? लेकिन उस विवादित ढांचे के गिरा दिए जाने से इस देश ने मुंबई बम विस्फोट के रूप में जो दर्द देखा और भोगा है, उसे भी नहीं भुलाया जा सकता है.सैकडों लोगों की जान चली गए. हजारों लोग जख्मी हुए.लोग अपाहिज हो गए.किसी का पति चला गया तो किसी का बेटा.इन दोनों घटनाओं के बाद से देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नयी राजनीतिक धारा का उदय हुआ.

अब तस्वीर का दूसरा पहलू देखिये......अयोध्या से साढ़े पांच सौ किलोमीटर दूर एक शहर है जबलपुर.ये आचार्य रजनीश, महर्षि महेश योगी का शहर है. ये महान व्यंग शिल्पी हरिशंकर परसाई का शहर है.अब यहाँ की एक और खासियत बता देतें है. यहाँ एक दिन भगवान राम का मंदिर गिराया जाता है तो दूसरे दिन किसी बाबा या औलिया की मजार तोड़ दी जाती है.जैन मंदिर और गिरिजाघर भी नहीं बचे हैं इस तोड़-फोड़ से.तब तो आप कहेंगे कि इस शहर में रोज दंगे होने चाहिए.....बम धमाकों की गूँज कभी बंद ही नहीं होनी चाहिए......यहाँ तो लाशों के ढेर लग जाने थे.........किन्तु आपको बता दें कि यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.गौर करने वाली बात ये भी है कि पुलिस और प्रशासन के साथ यहाँ के लोग भी इन धर्मं स्थलों को तोड़ने में जुट जाते है.

हो सकता है कि अयोध्या और जबलपुर की तुलना किसी को पसंद न आये.लेकिन जब सवाल धार्मिक आस्था का हो तो इससे फर्क नहीं पड़ता है कि पूजा स्थल छोटा है या बड़ा.इस देश में अक्सर धार्मिक प्रतीकों से छेड़छाड़ बड़े विवाद की वजह बन जाती है. फिर जबलपुर में ऐसा क्या हुआ कि 300 से ज्यादा पूजा स्थल तोड़ दिए गए और शहर अपनी रफ्तार से या कहें कि पहले से भी तेज गति से चलने लगा.इसका श्रेय जाता है यहाँ के अमन पसंद और समझदार नागरिकों को. वैसे तो सड़क या सार्वजनिक स्थानों पर बने मंदिर-मजार या अन्य पूजा स्थल सबको तकलीफ देते थे किन्तु धार्मिक मामला समझ कर कोई कुछ कहता नहीं था.एक सामाजिक कार्यकर्ता सतीश वर्मा को सड़क पर अतिक्रमण का रूप लेकर खड़े ये पूजा स्थल अखरने लगे तो उसने हाई कोर्ट में जनहित याचिका लगा दी.सतीश वर्मा ने खुद मेहनत करके 566 पूजा स्थल चिन्हित किये जो यातायात में बाधा उत्पन्न कर रहे थे.

इस विषय पर हाई कोर्ट भी गंभीर हो गया और उसने इन सभी धार्मिक स्थलों को हटाने के निर्देश दे दिए.लेकिन कोर्ट के आदेश से प्रशासन की पेशानी पर बल पड़ गए.क्योंकि उसके लिए एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति हो गयी.यदि वो मंदिर-मजारों पर सीधे बुलडोजर चला देता तो शहर में हालात बिगड़ सकते थे और यदि कार्यवाई नहीं करता तो फिर कोर्ट का कोड़ा उसे नहीं छोड़ता.अपने अधिकारों के रौब में कोई गलत फैसला लेने की बजाय उसने समझदारी से काम लिया.सभी धर्म के गुरुओं के साथ आपसी समझ बना कर प्रशासन ने सा-सम्मान पूजा स्थलों को हटाने की कार्यवाई एक बार जो शुरू की तो वो पूरे देश के लिए मिसाल बन गयी.सड़क और सार्वजनिक उपयोग के स्थानों में बाधक बन रहे इन पूजा स्थलों को हटाने की करवाई पिछले दो साल से चल रही है और इसमें न तो हिन्दू को आपत्ति है और न ही मुसलमान को.अब तक 302 धार्मिक अतिक्रमण हटाये जा चुके है.इसमें मंदिर और मजार के साथ दो ईदगाह ,एक चर्च तथा एक जैन मंदिर का अतिक्रमण भी शामिल है.बाकी के धर्मं स्थल हटाने की कार्यवाई भी निरंतर चल रही है.

मैंने जबलपुर की पहचान बताने के लिए महान व्यंग शिल्पी हरिशंकर परसाई जी का भी जिक्र किया था.उनके पास तो अयोध्या के विवाद का हल भी था . वे कहते थे न मंदिर बनाओ और न मस्जिद, वहां .........बना दो जिसका उपयोग सब कर सकें.लेकिन वे ठहरे व्यंग के चितेरे, सो उनका नजरिया विवाद को हलके ढंग से लेने का था, तभी वो हर बात को मजाकिया अंदाज में कहते थे.आज हरिशंकर परसाई जी जीवित होते तो जबलपुर में मंदिर-मस्जिद हटाने की कार्यवाई पर कोई न कोई रचना जरुर लिखते.जबलपुर के लोग भी अयोध्या को बड़ा गूढ़ सन्देश दे रहे है.वे कह रहे है - मानवता और लोकहित किसी भी पूजा स्थल से बड़े नहीं है.

हाय री किस्मत

एक दिन किसी अख़बार में खबर छपी कि जबलपुर से फिल्म स्टार आशुतोष राणा कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे.इस खबर ने नेशनल टीवी के हम जैसे पत्रकारों की बांछें खिला दी. मन ही मन समीकरण बैठाने लगे कि एक दिन आशुतोष को नर्मदा पूजा करवा देंगे तो बढ़िया खबर बिक जायेगी.किसी दिन मंदिर में अर्जी लगवा देंगे तो फिर खबर चल जायेगी.राणा जी का एकाध दिन का प्रचार तो बिक ही जायेगा. और अगर उनकी फिल्म स्टार पत्नी रेणुका शहाने प्रचार के मैदान में कूदीं तो शर्तिया एक खबर और बन जायेगी.ये भी सोचने लगे कि आजकल आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बहुत चल रहा है. यदि आशुतोष राणा ने धोखे से भी आचार संहिता का उल्लंघन कर दिया तो खबरों की संख्या बढ़नी निश्चित है.लेकिन हाय री किस्मत......मंदी के इस दौर में हम नेशनल टीवी पत्रकारों का राजनीतिक दलों ने भी ध्यान नहीं रखा.बीजेपी और कांग्रेस ने ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतार दिया है जिनको लेकर टीआरपी के लिए परेशान रहने वाले नेशनल टीवी चैनलों में तो बेरुखी है ही, मतदाता भी कुछ खास उत्साहित नहीं है. इतना ही नहीं आस-पास की सीटों में भी न तो कोई बड़ा नाम है और न ही कोई ग्लैमरस चेहरा जिसके सहारे ही हम लोग दो - चार खबरें बेच सकें.लोकसभा चुनाव के दौरान हम जैसे पत्रकार छुट्टी पर भी नहीं जा सकते क्योंकि भोपाल और दिल्ली आफिस से रोज पूछा जायेगा कि आपके क्षेत्र में क्या चल रहा है ? खबर एक नहीं लेंगे लेकिन इतना जरुर कहेंगे कि नजर रखना.कुछ छूटने न पाए. अब तो यही लग रहा है कि दिल्ली से आने वाले अपने चैनल के बड़े नाम वाले रिपोर्टरों की जी-हुजूरी में ही पूरा चुनाव निकल जायेगा.

Tuesday, March 24, 2009

पीपल बाबा को मिला साथी

लीजिये, वेंटिलेटर पर टिके बूढे पीपल बाबा अब अकेले नहीं रहे. उन्हें एक और साथी मिल गया है.१५० साल के बूढे पीपल के दरख्त के सफल स्थानांतरण से उत्साहित जबलपुर नगर निगम ने पीपल के एक और पेड़ को पुनर्स्थापित करने की कोशिश की है.करमचंद चौक के पीपल बाबा के बाद घमापुर चौक के एक और साल पुराने पीपल के दरख्त को श्रीनाथ की तलैया के पार्क में नया ठिकाना दिया गया है.अब पीपल को दोनों दरख्त श्रीनाथ की तलैया के पार्क में एक साथ नयी कोपलों के फूटने का इंतजार करेंगे.

Saturday, March 21, 2009

धन्यवाद मनुष्य

मैं एक पीपल का दरख्त हूँ.लोग मुझे एक सौ पचास साल का बूढा बता रहे है.लेकिन सच कहूं तो मुझे भी मेरी सही उम्र नहीं मालूम क्योंकि हमारी दुनिया में मिनट, घंटे, दिन, हफ्ते और साल का कोई गणित आज तक नहीं बन सका है.मैं आजकल बड़ा इठला रहा हूँ. और कह रहा हूँ धन्यवाद मनुष्य. तुने अपनी सांसों का कर्ज उतार दिया है. एक दरख्त मनुष्य का धन्यवाद करे, ये बात बड़ी अटपटी लगती है लेकिन जब मैं आपको पूरी कहानी बताऊंगा तो आप भी कहेंगे कि मनुष्यों ने वाकई काबिले-तारीफ काम किया है.

मेरा ठिकाना जबलपुर के करमचंद चौक पर हुआ करता था.वैसे एक बात बताऊँ - इस जगह का करमचंद चौक नाम तो कुछ सालों पहले पड़ा वर्ना जब मैंने भूमि के भीतर से अंकुरण लेकर आसमान को छूने की असफल कोशिश की थी , तब यहाँ कुछ नहीं था.पथिक मेरी छाँव का सहारा लेकर सुस्ताते थे तो बच्चे मेरे पीछे आँख-मिचौली का खेल खेलते थे.सन ४७ के पहले मैंने आजादी के मतवालों का जोशो-जूनून भी देखा था कि कैसे वे अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए अपनी जान की बाजी तक लगाने को तैयार रहते थे.देश आजाद हुआ और मैंने भी देश के आम मनुष्यों की तरह आजादी की सुकून भरी हवा को महसूस किया.

आजादी के बाद विकास की बात चली तो मैंने भी आधे-अधूरे विकास को देखा और उसके दुष्परिणाम को भोगा.हवा-पानी के तूफ़ान और मनुष्यों की झूठी शान के बीच मैं सीना तान कर इसी करमचंद चौक पर खडा रहा.मेरी छाँव में एक मंदिर बन गया और सुबह - शाम देवताओं की पूजा होने लगी.पीपल का दरख्त था और मनुष्य मानते है कि पीपल में देवता वास करते है , सो मुझे भी पूजा जाने लगा.फिर क्या था घमंड के मारे मैं दिनों-दिन और चौड़ा होने लगा.अपनी किस्मत पर इसलिए भी गुमान करने लगा कि इस देश में सब कुछ किया जा सकता है लेकिन मंदिर-मस्जिद को कोई हाथ तक नहीं लगा सकता है,फिर भले ही वो सड़क में ही क्यों न बने हों.मेरी छाँव में बना मंदिर मेरी सुरक्षा की गारंटी बन गया था.


लेकिन एक दिन मेरा सारा गर्व और दंभ जाता रहा, जब मैंने देखा कि मेरी छाँव में बने मंदिर से देवी-देवता पूजा-पाठ के बाद रुख्सत हो रहे है.मेरे कानों तक भी ये आवाज पहुंची कि सड़क चौडी करने के लिए पीपल के इस दरख्त को काटना होगा.ये सुनते ही मनुष्यों को सांसे देने वाले मुझ बूढे दरख्त की सांसे उखड़ने लगी.लगा की अब कुछ ही दिन का मेहमान रह गया हूँ.मेरी भी नियति विकास के नाम पर कत्ले-आम किये गए बाकी दरख्तों की तरह ही होगी.शायद आप को पता ही होगा कि कभी ये धरती पूरी तरह से हरियाली की चादर ओढे हुए थी, किन्तु मनुष्यों ने हम वृक्षों के साथ विकास के नाम पर ऐसी दुश्मनी निकाली कि आज हमारे साथ उसके अस्तित्व पर भी संकट मंडरा रहा है. अब मैं आप को बताता हूँ कि हमारी बिरादरी पर लाखों सालों से हुए अत्याचार के बावजूद मैं क्यों मनुष्यों को धन्यवाद कर रहा हूँ.पता नहीं जबलपुर की महापौर सुशीला सिंह को ये सदबुद्धि कहाँ से मिली जो उन्होंने मुझे काट कर अलग कर देने के आसान रास्ते की बजाय नए ठिकाने पर नव-जीवन देने की ठान ली.विशेषज्ञों की राय ली गयी.तय किया गया कि पहले मुझे कांट-छाँट कर छोटा किया जाये. दो महीने पहले मेरी कटाई-छंटाई शुरू हुयी.कपडे धोने वाले साबुन के विज्ञापन-''दाग अच्छे है''.....की तर्ज पर मैंने भी कहा - ''जख्म अच्छे है.''

कटाई - छंटाई के बाद दो माह तक मेरे शरीर से नयी कोपलें फूटने का इंतजार किया गया.जख्म मिलाने के बावजूद जब मेरे शरीर से हरियाली फिर फ़ुट पड़ी तो फिर शुरू हुयी मेरे नव जीवन की यात्रा.ये यात्रा इतनी कठिन थी कि कई बार मुझे भी लगा- मुकाम तक पहुँचने के पहले ही इस सफ़र का अंत न हो जाये और मेरी नियति भी बिरादरी के बाकी दरख्तों की तरह सूख कर चूल्हे में जलने की न हो जाये.धन्य है जबलपुर नगर निगम के वे जुझारू कर्मचारी, जिन्होंने आखिरी समय तक हिम्मत नहीं हारी.छोटी क्रेन काम नहीं आयी तो बड़ी क्रेन मंगाई गयी.छोटा ट्रक मेरे भार से टूट गया तो बड़ा ट्रेलर मंगाया गया.हाँ, यहाँ मैं इन क्रेन और ट्रक-ट्रेलर को भी धन्यवाद दूंगा- जो भले ही आज के समय में पर्यावरण और हरियाली के सबसे बड़े दुश्मन है , जिनकी मदद के बिना मैं अपने नए मुकाम तक नहीं पहुँच सकता था.

ये यात्रा पूरे २८ घंटे की थी.पहले क्रेन की मदद से मुझे नीचे लिटाया गया और फिर मुझे दवा का लेप लगाया गया.इसके बाद ट्रेलर की पीठ पर सवार होकर मैं करमचंद चौक से करीब दो सौ मीटर की दूरी पर बने पार्क में पहुंचा.यहाँ पर मनुष्यों ने फिर मुझे यथोचित सम्मान दिया और पूजा - पाठ के बाद धरती माँ की गोद में बिठा दिया. हालाँकि अभी मैं सिर्फ एक ठूंठ ही नजर आता हूँ लेकिन मैंने अपने कानों से विशेषज्ञों की बातें सुनी है कि दो-तीन महीने में मेरे जख्मों से ही नयी कोपलें फूट पड़ेंगी.अभी तो मैं लोगों के कौतुहल का विषय हूँ.लोग ये देखने आ रहे है कि नए ठिकाने पर मैं कैसा लगता हूँ.लोग जब मुझे छूते है तो अपनापन सा लगता है.कुछ दिन पहले तक यही मनुष्य मुझे दुश्मन नजर आते थे.

मैं बूढा दरख्त अब भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि कुछ दिन के लिए ही सही, मेरे शरीर में जवानी का जोश ला दे. मुझे फिर से हरा-भरा कर दे ताकि मनुष्यों द्वारा किया गया ये प्रयास व्यर्थ न जाये.कोई मुझे स्वार्थी न समझे. भगवान से ये कामना मैं अपने लिए नहीं कर रहा हूँ. मैं तो १५० बरस जी चुका हूँ. इस दुनिया में न भी रहूँ तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा.फर्क पड़ेगा उन दरख्तों को जिनकी नियति विकास के नाम पर बलि चढाने की है.यदि मुझमे फिर से नव-जीवन का संचार होगा तो मनुष्य अपने प्रयास पर मगन होते हुए, दरख्तों को काटने की बजाय नया ठिकाना देने के लिए सोचने लगेगा.और इसी में सृष्टि तथा मानवता की भलाई है.
..................... भविष्य में मेरे साथ क्या घटा, मैं ये भी आपको जरुर बताऊंगा....................आपका पीपल बाबा

Friday, September 5, 2008

जांबाजों को सलाम

वो मेरे मुहल्ले का नुक्कड़ तो नही है लेकिन वहां जो कुछ भी हुआ उसकी चर्चा करना जरूरी है.घटना जबलपुर शहर के नागरथ चौक की है.वक्त दोपहर के ३ बजे का था.राहगीर उस वक्त चौंक पड़े, जब सड़क किनारे खड़ा एक लोडिंग ऑटो रिक्शा अचानक चल पड़ा. ऑटो रिक्शा में कोल्ड ड्रिंक्स की बोतल लोड थी.ऑटो रिक्शा की दौड़ नाली की तरफ़ थी.एक-एक कर बोतल फूटने की आवाज के बीच ही किसी की चीख भी सुनायी दी.लोग जब तक दौड़ कर ऑटो रिक्शा तक पहुँचते तब तक १७-१८ साल का लड़का उसकी चपेट में आ चुका था. उसकी चीख लोगों के रोंगटे खड़े कर रही थी.ऑटो रिक्शा लगातार नाली की तरफ़ खिसक रहा था और लड़का दबता ही जा रहा था. लेकिन ४-५ मिनट की कोशिशों के बाद ऑटो रिक्शा को पीछे खींचा गया. जैसे - तैसे लड़के को बाहर निकल कर उसकी जान बचाई जा सकी.दरअसल ये लड़का मेकेनिक था.जब ऑटो रिक्शा ने उलटी दौड़ लगाई थी उस वक्त यह लड़का उसके नीचे लेटकर काम कर रहा था.लोगो की जांबाजी ने उसकी जान बचा ली.ऐसे जांबाजों को सलाम.